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एक पन्ना भारत माँ की डायरी का



प्रिय डायरी,

मैं भारत हूँ| धरती पर सबसे पुरानी संस्कृतियों में से एक, सदियों से मैंने अपने अन्दर भांति-भांति की भाषाओं, संस्कृतियों, परम्पराओं, धर्मों को समेटे रखा है| मेरे बच्चे, जो दुनिया भर में भारतवासी कहलाते हैं, प्रेम से मुझे “माँ” कहते हैं—”भारत माँ”| और सच कहूँ तो, मुझे गर्व है उन पर इस बात के लिए, क्यूंकि, उनका मुझे माँ कहना मेरे संस्कारों को दर्शाता है| दुनिया भर में और कोई ऐसा देश नहीं जिसके वासी उसे इतने प्रेम एवं सम्मान पूर्वक, मनुष्य जीवन का सबसे ऊंचा दर्जा देते हो—माँ का दर्जा| सुना है कभी तुमने, जापान चाचा, अमरीका अंकल, पाकिस्तान ख़ाला कहते हुए किसी को?

ये मेरे संस्कार ही तो हैं, जिनके कारण मेरे बच्चे रिश्तों का मूल्य समझते हैं| तभी तो यहाँ के लोग बचपन में ही पारिवारिक बंधुओं व पड़ोसियों को मामा, चाचा, काका, काकी, भाभी इत्यादि जैसे नामों से पुकारना सीख जाते हैं| तभी तो मैं, और सारा विश्व ये जानता और मानता है की भारत भूमि जैसी और कोई भूमि नहीं|

तुम सोच रही होगी, जिस माँ को उसके बच्चों का इतना सहारा हो, उसे भला तुम्हारी जैसी निर्जीव वस्तु की ज़रूरत क्यूँ पड़ी? तो लो, मैं बताती हूँ तुम्हे आज की जब बच्चे माँ का निरादर करने लगे, उसके दिए हुए संस्कारों को भूलकर, हर गलत रास्ते पर चलने लगे, तो कितना दुःख होता है| कितनी लाचार होगी वो माँ जिसके गुहार सुनने वाला कोई नहीं, जिसके बच्चे उसी को नोच नोच कर ख़त्म करने की होड़ में लगे हुए हैं—जानबूझ कर या अनजाने में, ये पता नहीं|

आज मेरी जो हालत है, प्रिय डायरी, वो उस बूढी, पगली भिखारन से कुछ कम नहीं, जो दर दर ठोकरें खाती फिरती है; जिसे लोग निकलते-गुज़रते गालियाँ देते जाते हैं और कुछ तो, उसके घावों पर और ज़ख्म देने से भी नहीं चूकते| फर्क बस इतना है, कि उस भिखारन पर तो फिर भी शायद कोई तरस खाकर उसे रोटी या थोड़े से सिक्के दे जाता हो, लेकिन मुझपर तरस खाने वाले, मेरे हित की सोचने वाला आज कोई नहीं| कोई नहीं|

सोचा करती थी कि मेरे बच्चे खूब नाम कमाएंगे, सारे जग़ को दिखा देंगे की इस देश जैसा कोई नहीं, तरक्की करेंगे, आगे बढ़ेंगे, अच्छे काम करेंगे और हमेशा मिल-बाँट के रहेंगे| पर ऐसा नहीं हुआ| जो हुआ, इसके बिलकुल विपरीत हुआ| बिलकुल विपरीत|

आज ये लोग आपस की ही लड़ाई नहीं सुलझा पा रहे, तो बाहरी ताक़तों का सामना कैसे करेंगे| एक वो वक़्त था, जब अंग्रेजों को भगाने की मुहीम में मेरे सारे बच्चे एक हो गए थे, जब मेरी रक्षा करने के लिए मेरे कई सपूतों और सुपुत्रिओं ने जान की बाज़ी लगाने में भी देर ना लगायी थी; यहाँ तक कि, आपसी मतभेदों को भुलाकर, हर कोई, अपने तरीक़े से एक ही क्रान्ति का हिस्सा बन बैठा था| फक्र हुआ था तब मुझे, अपनी संतानों पर| गर्व से फूली ना समां पा रही थी मैं, ये जानकार कि मेरे लाल मेरी आन पर कभी आंच ना आने देंगे| गलत थी मैं|

आज देखो तो पता चलता है, एकता में अनेकता क्या होती है| मेरी सरकार से जनता नाखुश है, जनता से सरकार नाखुश है, जनता आपस में भी नाखुश है और सरकार से सरकार में आने की होड़ में लगी अन्य पार्टियाँ नाखुश है| अरे कोई मुझसे भी तो पूछो, मैं तो इन सबसे ही नाखुश हूँ|

दूसरे देशों से आतंकवादी बेहया घुस आते हैं और मेरे मासूम बच्चों को मार गिराते हैं| मैं चुप हूँ, ये सोचकर कि मेरे बड़े बच्चे, जिन्हें छोटों ने मान देकर, वोट के ज़रिये भरोसा करते हुए सिंघासन पर बिठाया है, वो बदला लेंगे, मुजरिमों को उनके किये की सजा देंगे| अन्याय के ऊपर न्याय की जीत होनी ही चाहिए—मैंने उन्हें सिखाया है| एक साल, दो साल, तीन साल….सालों साल गुज़र जाते हैं और छोटे—जो तकनीकी तौर पर “जनता” कहलाते है—न्याय की अपेक्षा करते करते उम्र बिता जाते हैं| सरकारें बदलती हैं, नेतृत्व करने के लिए नए लोग आते-जाते रहते हैं, पर सुधार का कहीं नामों-निशान तक नहीं|

आज, दस साल हो चुके हैं जब अफज़ल गुरु नामक आतंकी ने मेरे संसद भवन पर हमला बोला था| हर दिन की तरह उस दिन भी खून के आंसूं रोई थी मैं, यह सोचकर कि क्या मेरे बच्चों की जान की कीमत इतनी सस्ती है? वहीँ कसाब, जिसके इसी दर्जे की एक दूसरी गतिविधि की तहत, मुंबई के सैंकड़ो मासूम भारतियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था, वह मुजरिम आज, इनकी जेल के अन्दर बंद, बाहरी आक्रोश से परे, मुफ्त की रोटियां तोड़ रहा है|
क्या यही सिखाया था मैंने अपने बच्चों को?

लोगों के आपस के लड़ने का रोना तो मैं क्या ही रोऊँ, जिस देश की सब्सी ऊंची पदवी पर से लोगों का भरोसा उठ चुका हो, जहाँ न्याय की अपेक्षा करना बंद हो चुका हो, जहाँ ऊपर से नीचे तक हर शक्स भ्रष्टाचार का शिकार हो चुका हो, वहाँ मानवता, प्रेम, एकता की उम्मीद करना मेरी बेवकूफी होगी| आज सबको पैसा चाहिए—सही पैसा, गलत पैसा, पर बस पैसा| हर कोई अपनी सोच रहा है| माँ-माँ कहके जिसके सामने बड़े हुए, उस भारत वर्ष की देखभाल करने वाला, उसके संस्कारों का नाम रौशन करने वाला आज कोई नहीं| नफरत सबके दिल में घर कर चुकी है| सब एक दूसरे पर दोष लगाने में व्यस्त हैं| किसी के पास इतना वक़्त नहीं की एक क्षण ठहरे और सोचे क्या सही है और क्या गलत| कहीं जाने ली जा रही हैं, तो कहीं भुखमरी से इंसान तड़प तड़प के दम तोड़ रहा है, कहीं मेरे हित और उद्धार के लिए लोगों का दिया पैसा भ्रष्ट मंत्रियों की जेबें गरम कर रहा है और कहीं धर्म-जाती के झगड़े आज भी समाप्त होने का नाम नहीं ले रहे हैं| मनुष्य मनुष्य की इज्ज़त करना भूल चुका है, आदमी औरत की और सरकार लोकतंत्र की| समस्याएँ अनेक हैं पर आपस में सब जुडी हुई| वहीँ मै सोच रही हूँ, मेरा क्या कुसूर जो इस दर्द से गुज़ारना पड़ रहा है मुझे? क्यूँ मेरा नाम बदनाम कर रहे हैं ये सब? क्यूँ अब भी अपने बच्चों को “भारत माँ की जय हो” के झूठे नारे सिखा रहे हैं, मेरे नाम का झंडा लहरा रहे हैं जब वास्तव में इनके लिए मेरा कोई अस्तित्त्व नहीं? आखिर क्यूँ?

डायरी, मुझसे भाग्यशाली तो तुम हो जिसे इतना सब होते हुए नहीं देखना पड़ रहा है, और ना ही जो आहत हो रही है इन कपटियों की हरकतों से| इतना कुछ गलत है हर ओर की गिनती करना असंभव है| ऐसे जीवन से तो अच्छी मृत्यु है|

बहुत देख लिया खून-खराबा, बहुत देख लिया कपट, लालच और भ्रष्टाचार, अब मेरी सहनशक्ति जवाब दे चुकी है| एक और बार अगर इनमे से किसी ने मुझे माँ कहकर पुकारा, तो मेरे सब्र का बाँध टूट जाएगा| अब तो बस उसी दिन का इंतज़ार है जब मैं आखरी सांस लूंगी| शान्ति तो अब मृत्यु के साथ ही आयेगी ….अशांति तो अब मृत्यु के साथ ही जायेगी…


(Slides by Rajat Goel and Sugandha, first published here)


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Sugandha

4 Comments

  • the post is written very nicely…just a small mistake….afsal guru attacked the parliament..it’s “sansad bhavan” in hindi…..”sarvochcha nyayalay” is the supreme court…..rest is awesome

  • बड़ा हृदयविदारक लेख है ! परन्तु आपकी बेहतरीन हिंदी पढकर माँ अवश्य प्रसन्न होगी 🙂

    • गिरिबाला जी, बहुत बहुत धन्यवाद| आशा है की मेरी हिंदी अभी ज़्यादा बुरी नहीं हुई है| बाकी माँ को तो पसंद आना ही चाहिए, आख़िर बचपन में मेरे हिंदी-ज्ञान के निर्माण में उनका सम्पूर्ण योगदान रहा है! :डी

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