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पर चलो फिलहाल सोते हैं



मस्कार

मैं एक आम आदमी की आत्मा हूँ. मैं सो रहा हूँ. कुछ भी कीजिये लेकिन मुझे ना जगाइए. बड़ी मुश्किल से लोगों ने मुझे शर्म की चादर से मीलों दूर, बेहयाई की गलियों में ला खड़ा किया है. कुछ भी हो जाये, मैं अब नहीं जागता. चैन की ज़िन्दगी है ये, लेकिन कभी-कभी मन भर जाता है सोते-सोते. और तो और, अगर जागने की कोशिश करूं, तो बस एक ही जवाब आता है ऊपर बैठे उस शरीर से… छोड़ ना, कौन सा तेरे बाप का कुछ जाता है. भाई साहब, अगर मैं जाग भी जाऊं, तो आस-पास की बाकी सोती हुई आत्माओं को देख कर बहुत दुःख होता है.

अब कल की ही बात ले लीजिये, वो अपने पड़ोस के खन्ना जी का लड़का किसी लड़की को चौराहे वाली दुकान में बैठे-बैठे कुछ बोल रहा था, जो कि मेरे ख्याल से गलत था. मैं जागा भी, लेकिन यह ऊपर बैठे शर्मा जी के शरीर ने मुझसे बोला, “चल यार, क्यों लड़के की चुगली कर के इसके घर में कलेश करवाऊं. वैसे भी कौन सा लड़की अपने जान पहचान वाले की है! अपनी सगी थोड़े ना है, चलता है यार.” और वो मुझे ले घर आ गए. और फिर हम निकल पड़े सब्जी लेने. वाह, क्या चुन-चुन के टमाटर लेते हैं शर्मा जी. पर, उसी बाज़ार में, एक सब्जी वाला अपनी घर वाली पे जोर-जोर से डंडो से वार कर रहा था और सब लोग चुप चाप खड़े तमाशा देख रहे थे. मैं वहाँ भी जागा लेकिन शर्मा जी ने फिर सुला दिया, ये कह कर कि सो जा, अगर ये आग हम बुझाने लगे तो अपने घर में चूल्हा नहीं जलेगा. और में फिर से सो गया. आराम से.

कभी-कभी तो मन होता है, छोड़ के निकल जाऊं इस शरीर को, लेकिन फिर ये सोचता हूँ, कि अगर मैंने भी हार मान ली तो यह जंग लड़ेगा कौन? सारे जहाँ से अच्छे इस हिंदुस्तान में किसी-न-किसी को सुधार का बीड़ा उठाना होगा और वो शायद मैं शुरू कर सकूं. लेकिन मुझे जाग जाने दो. नींद भी ऐसी चीज है जिसने मेरे देशवासियों को सदियों से अपने हक के लिए भी लड़ने से रोक दिया. सब सोते हैं. हर जगह की आत्मा सोती है, तो मैं अकेला ही क्यों जागता रहूँ? चलिए कल से मैं भी जाग जाऊं, लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि मेरे साथ वाले सभी लोग कल से ही समाज सुधार के काम में लग जायेंगे! शायद कोई नहीं जागेगा, और इसलिए मैं भी सोता रहूँगा. परन्तु मैं वादा करता हूँ, कि मैं बदलाव लाऊँगा! पर तब तक मुझे सोने दीजिये. आखिर आम आदमी की आत्मा हूँ, अकेला चना क्यूँ भाड़ फोड़े!


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Aashish Aryan

Yep. That's about it.

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