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चाय, अख़बार और देश का कल्याण


“अजी सुनते हैं, गुप्ता जी की वाइफ बोल रही थी कि साउथ का कोई कॉलेज है, जहाँ पैसे कम लगेंगे. उनकी ननद की छोटी वाली लड़की को वहीं एडमिशन दिलवाया है…” पाण्डेय जी की वाइफ रसोई घर से रोटी बेलते हुए बोली.

“हाँ, हाँ, देखते हैं. वैसे भी इस नालायक को कहीं भी भर्ती करवा दो, क्या फर्क पड़ता है इसे. लिखने का भूत सवार है. लेखक बनेंगे.” पाण्डेय जी अपने 18 वर्षीय पुत्र की तरफ देखते हुए बोले.

लड़का चुपचाप कोने में बैठा एक नावेल पढ़ रहा था. शायद किसी अंग्रेजी लेखक की थी. दुत्कारे जाने पर चूं तक ना बोला. ऐसे पढ़ता रहा जैसे उसने कुछ सुना ही ना हो. इकलौता था, पता था कि पिताजी पैसे छाती पे लाद कर ऊपर नहीं ले जाने वाले हैं, सो उसको कोई हाई-फाई कॉलेज में दाखिला आराम से मिल जायेगा. और फिर उसने तो ठान ली थी, कि एक दिन बड़ा लेखक ज़रूर बनेगा.

पाण्डेय जी ने बरामदे से फिर आवाज़ लगायी. “अजी सुनती हो, ज़रा चाय चढ़ा देना, कमलेश आ रहा है.” फिर अपने बेटे को आवाज़ लगायी, “अरे ओ कपूत, आज का अख़बार दे जा.” बेटा आया और अख़बार पटक कर चलता बना.

“अरे पाण्डेय भैया, आज का अख़बार पढ़ा? अरे पगला गयी है ये सरकार.” कमलेश बैठते हुए बोला.

tea“और नहीं तो क्या, एफ.डी.आई. में कोई 49 परसेंट अलाऊ करता है क्या… अरे लुट जायेंगे किसान. खेत, खलिहान सब बर्बाद.” गुप्ता जी भी आ गए और चहके, “और ये पढ़ा तुमने? अरे कोई कॉफ़ी की दुकान खुली है, बम्बई में कहीं पर. लिखा है मीलों लम्बी लाइन लगती है रोज़, कॉफ़ी पीने के लिए. अजीब लोग हैं, कॉफ़ी पीने के लिए इतनी जद्दोजेहद. अरे हमारी मिसेज़ से अच्छी कॉफ़ी कोई बना के तो दिखाए.” उन्होंने चुटकी ली और खिलखिला के हंस पड़े. खिखिलाहट की आवाज़ से उनके भी आगमन की सूचना प्राप्त हो गयी मिसेज़ पाण्डेय को, और उन्होंने उनके लिए भी चाय चढ़ा दी.

पाण्डेय जी ने फिर अख़बार की तरफ देखते हुए बोला, “मुझे तो लगता है कि अगली बार नरेन्द्र मोदी को ही प्रधानमंत्री बनना चाहिए. भाई, जो भी हो, उसने गुजरात की सूरत बदल दी. कहाँ अरविन्द केजरीवाल कंधे पे पहाड़ उठा के चल दिए हैं. उनके लिए तो वही जंतर-मंतर ही ठीक है. दो-चार नारे रोज़ लगा ले, और हर महीने एक बार भ्रस्टाचार-भ्रस्टाचार कर ले. चला मुरारी हीरो बनने.”

“अजी ऐसा क्यों कहते हैं आप? अरविन्द भाईसाहब ने नयी पार्टी बनायी है, आम आदमी की पार्टी, जहाँ आपको, हमको, हर किसी को बोलने का और कुछ करने का मौका मिलेगा.” कमलेश ने अपनी बात वजन के साथ रखा.

“धत्त! कुछ भी नहीं होना इस देश का. सब साले चोर बैठे हैं. ये क्रिकेट टीम को ही देख लो. घरेलू पिच है, और उसपे अंग्रेजों से ऐसे हार रहे हैं मानो चूहे-बिल्ली का खेल चल रहा हो. मुझे तो यकीन है यह सब साले पैसे खा के बैठे हैं. आम आदमी किस से उम्मीद बाँध के बैठे? साले सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं. मैं तो कहता हूँ अगर भ्रष्टाचार ख़तम करना है तो नोट छापना बंद करो. सारे हज़ार, पांच सौ और सौ के नोट ही मत छापो. अरे घूस का पैसा ट्रक में भर के कैसे ले जाता है कोई, ज़रा हम भी देखे!”

पाण्डेय जी दहाड़ ही रहे थे की उनकी वाइफ चाय और बिस्कुट का एक छोटा सा प्याला ले कर उपस्थित हुईं. पाण्डेय जी पर मानो किसी ने पानी फेर दिया हो. वो बिलकुल शांत हो गए. उनकी मिसेज़ हँसते हुए बोली, “अरे लो कमलेश, तुम्हारे दहेज के पैसों के नहीं हैं…” कमलेश ने शरमाते हुए एक बिस्कुट उठाया और बोला, “क्या भाभी आप भी ना. अभी तो बस सगाई हुई है, और आप अभी से चिढाने लगीं.”

और फिर गुप्ता जी की तरफ मुड़ कर बोली, “भाईसाहब, सुना है वो रिंकी का दाखिला आपने किसी अच्छे से कालेज में करवा दिया है. ज़रा बबलू पे भी ध्यान दीजिये. आपका ही तो भतीजा है.”

“लो, इसमें कौन सी बड़ी बात है भाभी. आप उसके मार्क-शीट के ज़ेरॉक्स मेरे यहाँ भिजवा देना. मैं सब संभाल लूँगा. बाकी भाईसाहब को बता दूंगा कैसे क्या पैसे लगने हैं. क्यों भाईसाहब, ठीक है ना?” गुप्ता जी ने पूछा.

“हाँ यार, करवा दे इस नालायक का भी कहीं. इस देश की तरह इसके भी दिमाग को दीमक खा गया है.” मिसेज़ पाण्डेय बातें सुन कर खुशी-खुशी अन्दर चली गयी.

रोज की तरह, थोड़ी देर बहस चली, कि अगला प्रधानमंत्री कौन हो, लोकपाल बिल आज तक क्यूँ नहीं पारित किया गया है, सचिन को क्यों अब खेलना छोड़ देना चाहिए, देश की अर्थव्यवस्था कैसे सुदृढ़ बनायी जाये, और कौन से गेंदबाज को किस तरह से खेलना चाहिए.

चाय ख़त्म हुई, अख़बार ख़त्म हुआ, और रोज़ की तरह… ख़त्म हुआ देश का कल्याण.


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Aashish Aryan

Yep. That's about it.

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