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विवाह के आंसू, ख़ुशी के या गम के?


शायद वह उत्सव का ही माहौल था। घर-चौबारे क़ी सजावट देख कर तो विवाह का अंदाज़ा लगाया मैंने। अतिथियों के स्वागत में बनाई हुई रंगोलियां और उस छोटे से मार्ग की सज्जा ने मन मोह लिया था।

सीढियां चढ़ा। देखा, अंदाज़ा सही साबित हो गया था। वह छोटा-सा घर महल क़ी तरह सजा था । हृदय में जाने क्यूँ हर्षोल्लास का द्रुत संचार हो उठा। सजावट और सौंदर्य से हृदय भीतर तक पुलकित हो चला। लड़की के पिता क़ी मेहनत क़ी खुशबू से घर-आंगन महक रहा था।

ना जाने क्यूँ…कदमो में गति-सी आ गयी। तेज़ी से कदम बढ़ा कर मैं मंडप तक पहुंचा। सुसज्जित मंडप किसी मंदिर-सा प्रतीत हो रहा था। नव युगल को मेरी आँखे ढूंढने लगीं। निकट आते ही कदम रुक से गए।

what-is-marriageदुल्हन विवाह क़ी लाल चोली में सजी हुई सिसकियाँ भर रही थी। यह विदाई का समय तो नहीं था। सब कुछ छिन्न-भिन्न पड़ा था। वधु के पिता को किसी इज्ज़तदार भद्र पुरुष के पैरों में झुका पाया मैंने। उनकी आँखों में आंसू देखे मैंने।

हतप्रभ-सा रह गया। कुछ समझ पाता, इसके पहले ही मेहमानों और रिश्तेदारों क़ी चर्चाओं क़ी गूँज मेरे कानो में बढ़ने लगी- “वर-पक्ष क़ी मांग को वधु-पक्ष अक्षरशः पूर्ण नहीं कर पाया था।”

विवाह टूट चुका था, लोग घरों को लौटने लगे थे।

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लेखक: चित्ररथ भार्गव


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