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नफरत नहीं, प्यार है, सच्चा प्यार।


दिवस था आज़ादी का, मौका था जश्न का, पर आठ वर्षीय कासिम का मन बिलकुल भी नहीं लग रहा था। उसे बार बार एक ही बात खायी जा रही थी। आखिर वो लोग उसके दोस्त नासिर को क्यूँ उठा ले गए? जिस किसी से भी पूछा, सब का एक ही जवाब था – “नासिर अब हमारे लिए जंग लड़ेगा, एक दिन हिंदुस्तान को नेस्तनाबूद कर दिखाएगा वो”।

दादाजी पास से ही गुज़र रहे थे। जब उन्होंने कासिम के सुबकने की आवाज़ सुनी, तो चुपके से अन्दर आ गए और कासिम को गोद में उठा लिया। प्यार से पुचकारा, और पूछा तो कासिम के जबान पे अनायास ही दिल की बात चली आई – “आखिर क्यूँ नफरत है हमें हिंदुस्तान से? और क्यूँ नफरत हैं उन्हें हमसे?”

दादाजी मुस्कुराये, आसमान की तरफ देखा और कहा, “नफरत नहीं बेटा, प्यार है। हमें उनसे और उन्हें हमसे।”

“मैं कुछ समझा नहीं।” कासिम बोला.

“सन 1947 की बात है। तब मैं तुम्हारी उम्र का रहा हूँगा, और कुछ तुम्हारे ही दोस्त नासिर जैसा एक मेरा भी दोस्त था, नाम था जसविंदर।”

“हिंदुस्तानी?” कासिम की आँखें उसके विचलित मन को छिपा ना सकीं|

Opulentus4“बेटा, उस वक़्त, मैं भी हिंदुस्तानी ही था। खैर, मैं कह रहा था जसविंदर मेरे भाई जैसा था | हम दोनों साथ उठते, सोते, खेलते, एक दूसरे के घर खाना खाते, और यहाँ तक की ‘अंग्रेजों भारत छोडो’ तक का नारा भी साथ लगाते थे| किसी अल्लाह और किसी भगवान में इतनी ताकत नहीं थी की वो हमे जुदा कर सके।”

दादाजी कहते-कहते चुप हो गए, और उनकी आँखें नम हो उठीं। शायद बिछड़ने का ग़म आज तक था। कासिम ने उनके आसुओं को पोछा, और कहा, “फिर कैसे जुदा हो गए आप दोनों, दादाजी?”

“जहाँ अल्लाह और भगवान तक ने हार मान ली, वहां अंग्रेजों, जिन्नाह, नेहरु एवं गाँधी ने ठान ली थी। बंटवारा हो गया, और देखते-देखते वह घड़ी आ गयी जब हम दोनों को ही अपने-अपने रास्ते पे चलना था। पर हम दोनों में अभी भी एक आशा की बुझती हुई किरण जल रही थी। ऐसा लगा की अगर एक दूसरे के हाथों को हम पूरा दम लगा कर पकड़ लें, तो शायद अभी भी अपनी दोस्ती का बंटवारा रोक सकें।”

“फिर?” कासिम का मन उत्तेजित हो चला था।

“होना क्या था? उसके घरवाले उसे घसीट कर ले जा रहे थे, और मेरे घरवाले मुझे। चारो ओर भगदड़, सब तरफ हंगामा, जलती झोपड़ियाँ, खून से लथपथ सड़कें, बस इन्हीं का नज़ारा था।

मैं अपने अब्बू की गोद में था, जब जसविंदर और उसके घर वालों को घेर लिया खून की प्यासी भीड़ ने। मैं रोया, गिड़गिड़ाया, चिल्लाता रहा, मगर किसी पर कुछ असर न हुआ, ना ही मेरे अब्बू पर और न ही उन दरिंदों पर। मेरे अपने भाई को उन्होंने पलक झपकते मेरी ही नज़रों के सामने मौत के घाट उतर दिया।” यह कहते हुए दादाजी के आँखें एक बार फिर नम हो चलीं।

कासिम ने दादाजी के कन्धों पर हाथ रख कर कहा, “मैं समझ गया दादाजी। नफरत हमें हिन्दुस्तानियों से और उन्हें हमसे नहीं, नफरत हमें उनसे है जिन्होंने हमें भाइयों से हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी बनाया। आखिर लहू तो जहाँ भी जाओ, लाल ही होती है।”

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Editing: Aashish Aryan


About the author

Kumar Pratik

Exorcist, Demonologist, and Master of the Dark Arts. Just kidding. Part of NTMN since May 2011 and Editor-in-Chief from 2013 to 2014.

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